अब की फागुन कुछ ऐसे रंग लगा देना

चुपके चुपके पीछे से आकर सीने से लेना, अब की फागुन कुछ ऐसे रंग लगा देना।रंगों में रंगे साथ बैठकर शाम गुजार देना, अबकी फागुन कुछ ऐसे रंग लगा देन

मैं डरा डरा सा सहमा सहमा सा

मैं डरा डरा सा सहमा सहमा सा पहुंचा जब था उस स्कूल में, मिले थे तूम ऐ दोस्त पुराने दोस्ती एक ऐसा रिश्ता जिसे कुछ लोहे की तारे और वादों ने बाटा

मुझे हर रात हैरान करती यही है

मुझे हर रात हैरान करती यही है, शरीफों के घर की सड़क भी खराब है। वो उस घर की बेटी आत्मनिर्भर और पाक है। फिर भी किसी के घर के चिराग की नज़रों का.

16 दिसम्बर: बीत गए 08 साल

16 दिसम्बर याद है न, या सब भूल गए। आज ही के दिन की थी वो काली रातये कैसे भुलाया जा सकता है निर्भया, जहाँ तुम चीखी थी, चिल्लाई थी, तड़पी थी, अपने जिस्मों को बचाने के लिए हर वो संभव प्रयास की थी। पर वहाँ सुनने वाला कोई नहीं था , तुम्हारा प्यार जिसके साथ तुम अपनी जिंदगी गुजारने […]