खुला पन्ना
मीडिया – मिसइन्फोरमेशन दिया

मीडिया – मिसइन्फोरमेशन दिया

जी हाँ दोस्तों वैसे तो मीडिया हमारे देश में आज़ादी के बाद से लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ माना जाता है, मगर नये जमाने की पत्रकारिता ने इस प्रतिष्ठा को पूर्णतः निराधार साबित कर दिया है। वह भी एक जमाना था, जब मीडिया निष्पक्ष पत्रकारिता करता था, मगर आज वही पत्रकार किसी बड़े नेता या किसी बड़े कारोबारी के हाथ की कठपुतली बना नाचता नज़र आ रहा है।

वह भी एक जमाना था, जब मीडिया निष्पक्ष पत्रकारिता करता था, मगर आज वही पत्रकार किसी बड़े नेता या किसी बड़े कारोबारी के हाथ की कठपुतली बना नाचता नज़र आ रहा है।
मीडिया

पत्रकारों की इस लगातार बिगड़ती छवि में सबसे बड़ा हाथ स्वार्थ और झूठी शान का है। नए मीडिया जगत के कुछ प्रभारियों को सही मायने में पत्रकारिता का मतलब ही नहीं पता होता है।आज के समय में लोगों ने पत्रकारिता को अपनी कमाई का एक जरिया बना लिया है। पहले लोग जनसंचार एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में जाना चाहते थे, जब उनसे पूछा जाता था; क्यों ? तो उनका बहुत ही सरल उत्तर होता था की पत्रकारिता एक सामाजिक सेवा है और हमें पत्रकारिता के माध्यम से लोगों तक जागरूकता फैलाने के नए आयाम को सिद्ध करने है। मगर आज के समय के बुद्धिजीवियों ने पत्रकारिता के मध्यम को बस कमाने व रौब जमाने का जरिया बना लिया है।

ऐसे में आम आदमी ने भी मीडिया को अपने मनोरंजन मात्र ही उपयोग करना शुरु कर दिया है। मीडिया जगत के इस छवि को बिगाड़ने में जितना मीडियाकर्मियों का हाथ है, उतना ही हाथ आम जनता का भी है।

आज के समय में लोगों का एक सीधा सा नारा है। मीडिया बिकी हुई है, मगर मीडिया बिकी कैसे, उसको किसने बेचा? यह एक बड़ा सवाल है और सही से देखा जाए तो इस सवाल का जवाब हम सबके पास है।

“खबर वह होती है जिसे कोई दबाना चाहता है। बाकी सब विज्ञापन है। मकसद तय करना दम की बात है। मायने यह रखता है कि हम क्या छापते हैं और क्या नहीं छापते”।

-कैथरीन ग्राहम

भारत का गण – तंत्र

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