पल दो पल का शायर
मां

मां

मां : इस कविता के बारे में मुझे ज्यादा कुछ बोलने की जरूरत नहीं है, क्योंकि इसका शीर्षक ही बहुत कुछ बयां कर रहा है।

सब कहते हैं तूने 9 माह तक अपने लहू से मुझे अंकुरित किया था ।

मेरे जन्म के दर्द में भी तेरा चेहरा मुस्कुराया था।

छाती का दूध पिलाकर तूने मुझे कर्जदार बनाया था,

जेष्ठ की दुपहरी में तूने फुसला कर मुझे सुलाया था।

पापा की डांट से बचने के लिए अक्सर तूने मुझे आंचल में दुपकाया था ।

अपने लहू से सींचकर तूने मुझे चलने लायक बनाया था।

जब भी कभी में अपनी राह से भटकूँ, तूने मुझे सही डगर दिखाया था।

अपनी रातों की नींद से कहीं दूर जाकर तूने मुझे सुलाया था,

खाने में रोटी कम हो जाने पर, खुद न आकर तूने मुझे खिलाया था

ये कुछ कर्ज़ हैं मुझपर जो मैं सातों जनम में भी न उतार पाऊं,

तेरे कर्ज के बोझ के तले दबकर मैं हर जन्म ऐसे ही मर जाऊं।


प्यार कहते हैं किसे, और ममता क्या चीज़ है,
कोई उन बच्चों से पूछे जिनकी मां नहीं होती।

मिलती तो हर खुशियां हैं उन्हें, पर आंसू पोछने को मां की साड़ी का पल्लू नहीं मिलता।

स्कूल से घर आने को कोई रास्ता नहीं निहारता।

अपने हाथों से दूध रोटी खिलाने वाला वो हांथ नहीं मिलता।

जी भर के रोने को जी चाहे तो मां की गोंद का सहारा नहीं मिलता।

देर तलक सोने पर भी कोई डांट कर जगाने को नहीं मिलता।

ये कुछ दर्द उन्हें मिलते हैं, जिनकी माँ नहीं होती।

पर मां, मां तो हर रूप में दिखती है।

पूजा वाले मंदिरों की घण्टियां है माँ,

मांजने वाले बर्तनों की खनक है माँ,

कपड़ों में आ चुके मैल की सर्फ है मां

तवे पर रोटी को पकाने वाली चिमटा है माँ

चोट लगने पर हल्दी प्याज की मलहम है माँ

रातों के नींद की मसलन है मां

पिता के बुढापे की लाठी भी है माँ

स्वार्थी समाज में निःस्वार्थ भाव की परिभाषा भी है माँ

घर में जलते दिए कि लौ है मां

धरती पर देवी दुर्गा का एक रूप है मां

कलम की कोख से और भी

1 thought on “मां

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