खुला पन्ना
संभोग

संभोग

“संभोग”

संभोग; अपने अकड़े हुए बदन और बिखरे हुए बालों को समेटते हुए उसने खुद को भी समेटना चाहा…. ब्लाउज के हुक को बंद करते करते वो उठी मगर बिस्तर के सिलवटों ने उसके जज्बातों को फिर से वही दफनाना चाहा….!!

किनारे पड़ी अपनी साड़ी को उसने उठाकर खुद पर लपेटना शुरू तो किया मगर उसका अंत वो खुद नहीं ढूंढ़ पायी…. आइने के सामने खड़े होकर मंगलसूत्र में बंधा वो अपना जिस्म तो देखती रही मगर अपने रूह को वो कहीं नहीं ढूंढ़ पायी….!!

होठों पर चोट और स्तन पर दातों के निशानों से अब उसको दर्द महसूस होना बंद सा हो गया था… गर्म पानी से नहाने पर भी उसपर कोई प्रभाव नहीं हो रहा मानों उसका शरीर अब संवेदनहीन सा हो गया था…!!

संभोग; अपने अकड़े हुए बदन और बिखरे हुए बालों को समेटते हुए उसने खुद को भी समेटना चाहा.... ब्लाउज के हुक को बंद करते करते वो उठी मगर बिस्तर के सिलवटों ने उसके जज्बातों को फिर से वही दफनाना चाहा....!!
संभोग

बाहर आते ही वो साड़ी तो पहन रही थी मगर उसकी इज्जत उसी के नज़रों में उतर रही थी….. वो अपने बालों को सुलझा सिंदूर तो लगा रही थी मगर अपने साथ हर रात हो रहे बदसलूकी में उलझ रही थी…!!

बिस्तर पर पड़ी कांच की टूटी चूड़ियां कहीं ना कहीं उसको अपने टूटे हुए आत्मसम्मान का याद दिला रही थी…. बिखरे हुए समान की तरह बिखरी सी वो खुद की अहमियत भूली जा रही थी…..!!

हर रात बिस्तर पर उसको वस्तु समझ पति बस अपना हवस मिटा रहा था…

ना उसकी सहमति ले रहा था ना उसका दर्द वो समझ पा रहा था…

बाहर आते ही वो साड़ी तो पहन रही थी मगर उसकी इज्जत उसी के नज़रों में उतर रही थी..... वो अपने बालों को सुलझा सिंदूर तो लगा रही थी मगर अपने साथ हर रात हो रहे बदसलूकी में उलझ रही थी...!!
संभोग

महिला दिवस

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