शब्द संग्रहालय
महिला दिवस

महिला दिवस

महिला समाज की वास्तुकार होती हैं, एक शिक्षित महिला सम्पूर्ण समाज को शिक्षित करती है। आज का दिन विश्व भर में महिला दिवस के रूप में मनाया जाता हैं। आज के दिन हम भारत की उन महिलाओं को याद करते हैं, जिनके योगदान ने भारत को बुलंदियों पर पहुंचाया जिनके योगदान से भारत को समय समय पर नयी पहचान मिली और आज के समय में भी मिलती आ रही हैं।

भारत की पहली महिला राष्ट्रपति

साधारण रंगों वाली साड़ी और माथे पर बड़ी सी बिंदी लगाने वाली एक साधारण पहनावे वाली महिला जो राजनीति में आने से पहले सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में समाज की सेवा में अपने कार्य कर रही थी।

प्रतिभा पाटिल हमेशा से एक बेहद सम्माननीय महिला के तौर पर देखी गयी हैं। सिर्फ इसीलिए नहीं कि वह भारत की राष्ट्रपति रह चुकी हैं, बल्कि देश को सर्वोच्च पद पर पहुंचने के बाद भी उन्होंने एक महिला होने के नाते अपनी गरिमा को बनाए रखा, उनका व्यक्तित्व स्वयं ही एक शांत और निर्मल स्वभाव की महिला की पहचान बना रहा।
प्रतिभा पाटिल

प्रतिभा पाटिल हमेशा से एक बेहद सम्माननीय महिला के तौर पर देखी गयी हैं। सिर्फ इसीलिए नहीं कि वह भारत की राष्ट्रपति रह चुकी हैं, बल्कि देश को सर्वोच्च पद पर पहुंचने के बाद भी उन्होंने एक महिला होने के नाते अपनी गरिमा को बनाए रखा, उनका व्यक्तित्व स्वयं ही एक शांत और निर्मल स्वभाव की महिला की पहचान बना रहा।

प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने महिलाओं के कल्‍याण को प्रमुखता देते हुए मुम्‍बई, दिल्‍ली जैसे महानगरों में कामकाजी महिलाओं के लिए छात्रावास की स्थापना करवाई. ग्रामीण युवाओं के लाभ हेतु जलगांव में इंजीनियरिंग कॉलेज के अलावा श्रम साधना न्यास की भी स्‍थापना की. इसके अलावा प्रतिभा देवी सिंह पाटिल की देख-रेख में महिला विकास महामण्‍डल, जलगांव में दृष्टिहीन व्‍यक्तियों के लिए औद्योगिक प्रशिक्षण विद्यालय और विमुक्‍त जमातियों तथा बंजारा जनजातियों के निर्धन बच्चों के लिए एक स्‍कूल की स्‍थापना करवाई गई.

प्रतिभा देवी सिंह पाटिल की हमेशा से विशेष रुचि ग्रामीण अर्थव्‍यवस्‍था के विकास और महिलाओं के कल्‍याण में रही हैं। प्रतिभा पाटिल ने जलगांव जिले में महिला होम गार्ड का समुदाय बनाया और उसका आयोजन कर खुद ही उस समुदाय की कमांडेंट भी रह चुकी हैं। प्रतिभा पाटिल राष्ट्रिय सहकारी शहरी बैंक और ऋण संस्‍थाओं की उपाध्‍यक्ष तथा बीस सूत्रीय कार्यक्रम कार्यान्‍वयन समिति, महाराष्‍ट्र की अध्‍यक्षा भी रही प्रतिभा देवीसिंह पाटिल ने अमरावती में दृष्टिहीनों के लिए एक औद्योगिक प्रशिक्षण विद्यालय, निर्धन और जरूरतमंद महिलाओं के लिए सिलाई कक्षाओं, पिछड़े वर्गों और अन्‍य पिछड़े वर्गों के बच्‍चों के लिए नर्सरी स्कूलों को खोल कर उल्‍लेखनीय योगदान दिए तथा किसान विज्ञान केन्‍द्र, अमरावती में किसानों को फसल उगाने की नई एवं वैज्ञानिक तकनीकें सिखाने, संगीत और कम्‍प्‍यूटर की कक्षाएं भी आयोजित करवाई थी।

भारत की पहली महिला पत्रकार

जब देश अंग्रेजी हुकुमत के फंदे में था और तब किसी महिला का आगे बढ़कर ना केवल पत्रकारिता में अपनी मजबूत दखल बनाना बल्कि संपादक की जिम्मेदारी तक पहुंच जाना मायने रखता है। यह नाम है हेमंत कुमारी देवी जो देश की पहली महिला पत्रकार बनी।
हेमंत कुमारी देवी

जब देश अंग्रेजी हुकुमत के फंदे में था और तब किसी महिला का आगे बढ़कर ना केवल पत्रकारिता में अपनी मजबूत दखल बनाना बल्कि संपादक की जिम्मेदारी तक पहुंच जाना मायने रखता है। यह नाम है हेमंत कुमारी देवी जो देश की पहली महिला पत्रकार बनी। हेमंत कुमारी वर्ष 1888 में इलाहाबाद से प्रकाशित होने वाली महिलाओं की पत्रिका- ‘सुगृहिणी’ की संपादक थीं हेमंत कुमारी देवी का जन्म 1868 में हुआ था। वे शिलांग के ब्रह्म समाज के अनुयायी नवीन चंद्र राय की पुत्री थीं।

‘सुगृहिणी’ के प्रथम अंक में उन्होंने संपादकीय में एक विशेष संवाद लिखा था। प्रस्तुत है उसके अंश:…  

“ओ मेरी प्रिय बहन, अपने दरवाजें को खोलो और देखो कि कौन आया है ? यह आपकी बहन ‘सुगृहिणी’ है। यह आपके पास इसलिए आई है क्योंकि आप पर अत्याचार हो रहा है, आप अशिक्षित हो और एक बंधन में बंधे हो… इसका स्वागत करो और इसे आशीर्वाद दो। मां तुम्हारी और सुगृहिणी की सहायता करें।” 

-हेमंत कुमारी यादव

हिन्दी क्षेत्र उन दिनों में भी पिछड़ा हुआ इलाका था, जहां महिलाओं में निरक्षरता बहुत ज्यादा थी और यहां तक कि अच्छे घरों की महिलाओं में भी साक्षरता की कमी थी। अधिकांशत:  औरतों को कोई औपचारिक शिक्षा नहीं मिली थी। ब्रह्म समाज ने महिलाओं की स्थिति में सुधार के लिए शिक्षा पर जोर दिया, जिसके परिणामस्वरूप विभिन्न प्रकाशनों का पदार्पण हुआ। हेमंत कुमारी देवी की मातृभाषा बंगाली थी। उनकी प्रारंभिक शिक्षा आगरा में रोमन कैथोलिक कन्वेंट और उसके बाद लाहौर एवं कलकता में हुई थी। उन्हें हेमंत कुमारी चौधराइन के नाम से भी जाना जाता है। 1906 में वे पटियाला गईं जहां वे 1924 तक रहीं और उसके बाद उनकी पोस्टिंग देहरादून में नगर निगम आयुक्त के पद पर हुई, जहां उनकी मृत्यु 1953 में हो गई।

भारत की पहली महिला इंजीनियर

एक मध्यम वर्गीय तेलगु परिवार में जन्मी ए ललिता की शादी तब कर दी गई थीं जब वह मात्र 15 वर्ष की थीं। 18 साल की आयु में ये एक बच्ची की माँ बनीं और दुर्भाग्यवश इसी के चार महीने बाद ही उनके पति का निधन हो गया। 4 माह की श्यामला अब पूरी तरह से अपनी विधवा माँ की ज़िम्मेदारी थी।
ए ललिता

एक मध्यम वर्गीय तेलगु परिवार में जन्मी ए ललिता की शादी तब कर दी गई थीं जब वह मात्र 15 वर्ष की थीं। 18 साल की आयु में ये एक बच्ची की माँ बनीं और दुर्भाग्यवश इसी के चार महीने बाद ही उनके पति का निधन हो गया। 4 माह की श्यामला अब पूरी तरह से अपनी विधवा माँ की ज़िम्मेदारी थी।

हालांकि मद्रास में तब सती प्रथा का चलन नहीं था फिर भी एक विधवा को समाज से अलग, एक निर्वासित व कठिन जीवन जीना पड़ता था। प्रगतिशील विचारों व दृढ़ निश्चय वाली ललिता ने वैसे समय में समाज के दबाव में न आकर अपनी पढ़ाई को आगे बढ़ाने की ठानी और इंजीनियरिंग करने का फैसला किया। यहीं से शुरू हुआ उनका वह सफर जिसने उन्हें भारत की पहली महिला इंजीनियर बना दिया।

ललिता के पिता पप्पू सुब्बा राव, मद्रास विश्वविद्यालय के कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग, गिंडी (CEG) में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के प्रोफेसर थे। उन्होने वहाँ के प्रधानाचार्य केसी चाको, पब्लिक इन्सट्रक्शन के निदेशक आरएम स्ताथम से बात की।

दोनों ने इस कॉलेज में एक महिला को दाखिला देने का समर्थन किया। यह CEG के इतिहास में पहली बार होने वाला था। ललिता की बेटी श्यामला बताती हैं, “लोगों की सोच के विरुद्ध, कॉलेज के विद्यार्थी का रवैया बहुत सहयोगपूर्ण था। सैकड़ों लड़कों के बीच वह अकेली लड़की थीं पर उन्हें कभी किसी ने असहज नहीं होने दिया। वहाँ अधिकारियों ने उनके लिए एक अलग हॉस्टल का प्रबंध भी किया। जब वह कॉलेज की पढ़ाई पूरी कर रही थीं तब मैं अपने अंकल के पास रहती थी और वो सप्ताह के अंत में मुझसे मिलने आया करती थीं।”

उन्होंने अपनी पढ़ाई के बाद नौकरी की और देश में अन्य महिलाओं के लिए भी इंजीनियरिंग के ररास्ते खोल दिए। अपने पूरे करियर में ललिता ने दो बातों का हमेशा ख्याल रखा – पहला, उनकी बेटी का पालन पोषण प्यार भरे माहौल में हो और दूसरा, एक पुरुष प्रधान समाज में उनका औरत होना किसी भी प्रकार की रुकावट न बने।

भारत की पहली महिला वैज्ञानिक

डॉक्टर असीमा चटर्जी ने अपनी मेहनत और लगन से मिर्गी जैसी खतरनाक बीमारियों से लड़ने का फार्मूला निकाला। इसके अलावा इनका मुख्य योगदान की कैंसर दवाई बनाने में रहा है।
डॉक्टर असीमा चटर्जी

भारत की पहली महिला वैज्ञानिक असीमा चटर्जी हैं। इन्होंने मेडिसिन तथा ऑर्गेनिक केमिस्ट्री के क्षेत्र में काफी अहम खोज किया था। असीमा चटर्जी 23 सितंबर 1917 को कोलकाता में जन्मी थीं। डॉक्टर असीमा चटर्जी भारत की मशहूर रसायन शास्त्री थी। इन्होंने ऑर्गेनिक केमेस्ट्री और पैथोमेडिसिन (Phytomedicine) के क्षेत्र में शिक्षा हासिल की थी। डॉ असीमा चटर्जी ने अपने लगन और मेहनत से ऐसे फार्मूला की खोज की जिससे भयंकर बीमारियों से लड़ा जा सकता था।

डॉ असीमा चटर्जी ने कोलकाता विश्वविद्यालय से 1936 में केमेस्ट्री में ग्रैजुएट हुई फिर 1944 में ऑर्गेनिक केमिस्ट्री में डॉक्टोरल डिग्री भी हासिल की। असीमा चटर्जी को रसायन शास्त्र बहुत लगाव था। उन्होंने अपना पूरा जीवन रिसर्च में व्यतीत किया था। इन्होंने अपने जीवन में पौधे पर बहुत कम किया और साइंस में डॉक्टरेट पाने वाली पहली महिला बनी।

कैंसर की दवाओं के खोज में योगदान

डॉक्टर असीमा चटर्जी ने अपनी मेहनत और लगन से मिर्गी जैसी खतरनाक बीमारियों से लड़ने का फार्मूला निकाला। इसके अलावा इनका मुख्य योगदान की कैंसर दवाई बनाने में रहा है। इन्होंने अपने रिसर्च से विंका अलकोलॉइस (Vinca alcoloise) की खोज की। यह कैंसर को खत्म करने के लिए मॉडर्न कीमोथेरेपी में काफी कारगर रहा था। Vinca alkaloids कैंसर की गति को धीमा करके कैंसर को जड़ से खत्म करता है। इनके नाम कई अन्य महत्वपूर्ण दवाओं के खोज करने का रिकॉर्ड दर्ज है।

असीमा चटर्जी ने अपनी मेहनत और कुछ कर जाने के जुनून से भारत का नाम रोशन किया। इन्होंने कोलकाता विश्वविद्यालय के लेडी ब्रेबोर्न कॉलेज में नियुक्त हुईं। इसके अलावा वह विज्ञान अकादमी नई दिल्ली में फेलो चुनी गई। इनको इंडियन साइंस कांग्रेस का भी अध्यक्ष बनने का मौका मिला। भारत सरकार से इनको पद भूषण अवार्ड से सम्मानित किया गया था।

भारतीय महिला हर स्तर पर प्रथम
डॉ पद्मा बंदोपाध्याय भारत की पहली महिला एयर वाइस मार्शल हैं। वह भारतीय वायु सेना की एयर कमोडोर पद पर पदोन्नत होने वाली पहली महिला अधिकारी और भारत के एयरोस्पेस मेडिकल सोसायटी की पहली सदस्य हैं।
डॉ पद्मा बंदोपाध्याय

डॉ पद्मा बंदोपाध्याय भारत की पहली महिला एयर वाइस मार्शल हैं। वह भारतीय वायु सेना की एयर कमोडोर पद पर पदोन्नत होने वाली पहली महिला अधिकारी और भारत के एयरोस्पेस मेडिकल सोसायटी की पहली सदस्य हैं। वह उत्तरी ध्रुव में वैज्ञानिक अनुसंधान करने वाली पहली भारतीय महिला हैं। पद्मा बंदोपध्याय की एक और उपलब्धि यह है कि वह भी रक्षा सेवा स्टाफ कॉलेज कोर्स पूरा करने वाली पहली महिला अधिकारी हैं। 1973 में उन्हें विशिष्ट सेवा पदक प्राप्त हुआ और 1991 में उन्हें एएफएचए सम्मान मिला था।

भारत की वो पहली महिला जिसने अंतरिक्ष में लहराया भारत का परचम
कल्पना चावला एक भारतीय अमरीकी अंतरिक्ष यात्री और अंतरिक्ष शटल मिशन विशेषज्ञ थी और अंतरिक्ष में जाने वाली प्रथम भारतीय महिला थी। वे कोलंबिया अन्तरिक्ष यान आपदा में मारे गए सात यात्री दल सदस्यों में से एक थीं।
कल्पना चावला

कल्पना चावला एक भारतीय अमरीकी अंतरिक्ष यात्री और अंतरिक्ष शटल मिशन विशेषज्ञ थी और अंतरिक्ष में जाने वाली प्रथम भारतीय महिला थी। वे कोलंबिया अन्तरिक्ष यान आपदा में मारे गए सात यात्री दल सदस्यों में से एक थीं।

भले ही 1 फरवरी 2003 को कोलंबिया स्पेस शटल के दुर्घटनाग्रस्त होने के साथ कल्‍पना की उड़ान रुक गई लेकिन आज भी वह दुनिया के लिए एक मिसाल है। नासा वैज्ञानिक और अंतरिक्ष यात्री कल्पना चावला का जन्म हरियाणा के करनाल में हुआ था।

कल्पना अंतरिक्ष में जाने वाली प्रथम भारतीय (उन्होंने अमेरिका की नागरिकता ले ली थी) महिला थी। उनके पिता का नाम बनारसी लाल चावला और मां का नाम संज्योती था। कल्पना ने फ्रांस के जान पियर से शादी की जो एक फ्लाइंग इंस्ट्रक्टर थे।

विश्व हिंदी दिवस

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